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बुढ़िया की छींक

by Himanshi Sharma

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बुढ़िया की छींक
एक बूढ़ी औरत थी | उसको एक अजीब दिक्कत थी उसको सुबह से छींक नहीं आ रही पर हर बार लग रहा था की मानो अब छींक आएगी | अब बेचारी बुढ़िया घर पर हर कोशिश कर चुकी थी पर छींक थी की आयी ही नहीं | तब बुढ़िया घर से बाहर टहलने निकली | रास्ते में उसे कुछ पत्ते दिखे | उसने पत्ते उठाये और सारे पत्ते निगल लिये | पता नहीं उसने पत्ते क्यों खाये? पर शायद इतने पत्ते खाने के बाद उसको छींक आये !! अरे ! ये क्या उसको तो छींक नहीं आयी |
बूढ़ी औरत आगे बढ़ी तो एक कमीज़ दिखी उसने सोचा शायद ये निगल कर छींक आयेगी | उसने वो भी निगल ली | पर छींक तो जैसे ना आने की ज़िद पर अड़ी थी |
बुढ़िया बेचारी छींक ना आने से बेहद परेशान....वो टहलती हुई आगे बढ़ी तो एक कद्दू दिखा | उसने सोचा इसे निगल कर तो पक्का छींक आ जायेगी | बस , फिर क्या था उसने कद्दू उठाया और बड़ा सा मुँह खोला और कद्दू पेट में | पर अफ़सोस , छींक अब भी नहीं आयी |
सोचो ज़रा, बुढ़िया के पेट में क्या-क्या है ??
बुढ़िया आगे बढ़ी तो उसको एक लम्बी-सी एक छड़ी मिली | बुढ़िया ने सोचा - वाह ! इससे तो छींक झट से आ जायेगी और ऐसा सोचते ही उसने छड़ी निगल ली | पर वही हुआ जिसका डर था | छींक अभी भी नहीं आयी |
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